अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ती तल्खी अब उस मोड़ पर आ गई है जहाँ दुनिया को तीसरे विश्व युद्ध की आहट सुनाई देने लगी है। हाल ही में रूस ने इस पूरे विवाद में कूदकर सबको चौंका दिया। मॉस्को ने दोनों देशों के बीच युद्धविराम के लिए मध्यस्थता की पेशकश की है। ये कोई छोटी बात नहीं है। जब दुनिया की दो महाशक्तियां आमने-सामने हों और तीसरी महाशक्ति बीच-बचाव का रास्ता दिखाए, तो समझ लीजिए कि पानी सिर से ऊपर जा चुका है।
पश्चिमी एशिया में अशांति का सीधा असर भारत समेत पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। कच्चा तेल महंगा होगा और महंगाई आसमान छुएगी। रूस जानता है कि अगर ये लड़ाई आगे बढ़ी, तो उसे भी कहीं न कहीं इसमें घसीटा जाएगा। इसलिए व्लादिमीर पुतिन की सरकार ने शांति का प्रस्ताव मेज पर रखा है। लेकिन सवाल ये है कि क्या वाशिंगटन और तेहरान इसे गंभीरता से लेंगे? या फिर ये सिर्फ एक डिप्लोमैटिक स्टंट है?
अमेरिका और ईरान की पुरानी दुश्मनी में रूस का नया दांव
रूस और ईरान के रिश्ते पिछले कुछ सालों में काफी मजबूत हुए हैं। खासकर यूक्रेन युद्ध के बाद से ईरान ने रूस को ड्रोन और दूसरी सैन्य मदद दी है। अब रूस इस अहसान को चुकाने के साथ-साथ खुद को ग्लोबल पीसमेकर के तौर पर पेश करना चाहता है। रूस का कहना है कि वो दोनों पक्षों को बातचीत की मेज पर लाने के लिए तैयार है।
लेकिन अमेरिका के लिए रूस पर भरोसा करना इतना आसान नहीं है। जो बाइडन प्रशासन को लगता है कि रूस इस विवाद का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए कर सकता है। अगर मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ता है, तो पूरी दुनिया का ध्यान यूक्रेन से हट जाएगा। ये रूस के लिए एक बड़ा एडवांटेज होगा। इसलिए रूस की इस पेशकश के पीछे की मंशा को समझना बेहद जरूरी है। क्या पुतिन वाकई शांति चाहते हैं या फिर वो अमेरिका को घेरने की कोई नई चाल चल रहे हैं?
तेल की कीमतें और वैश्विक अस्थिरता का खतरा
अगर अमेरिका और ईरान के बीच सीधे जंग छिड़ती है, तो सबसे पहले निशाना 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' बनेगा। ये वो समुद्री रास्ता है जहाँ से दुनिया का लगभग 20% कच्चा तेल गुजरता है। ईरान ने कई बार धमकी दी है कि अगर उस पर हमला हुआ, तो वो इस रास्ते को बंद कर देगा।
- कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जा सकती हैं।
- डॉलर के मुकाबले रुपया और कमजोर हो सकता है।
- सप्लाई चेन पूरी तरह से ठप पड़ने का डर है।
रूस की दिलचस्पी इसमें इसलिए भी है क्योंकि वो खुद तेल का एक बड़ा निर्यातक है। तेल की कीमतें बढ़ने से रूस की तिजोरी भरेगी, लेकिन एक बड़ी जंग रूस की अपनी सीमाओं के पास भी अस्थिरता ला सकती है। इसलिए रूस चाहता है कि तनाव बना रहे, लेकिन युद्ध न हो। ये एक बहुत ही बारीक बैलेंस है जिसे रूस साधने की कोशिश कर रहा है।
क्या युद्धविराम वाकई मुमकिन है
ईरान की अपनी शर्तें हैं। वो चाहता है कि अमेरिका उस पर लगे तमाम आर्थिक प्रतिबंध हटा ले। दूसरी तरफ अमेरिका का कहना है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह बंद करे और इजरायल के खिलाफ अपनी बयानबाजी रोके। ये दोनों ही शर्तें ऐसी हैं जिन पर कोई भी पक्ष पीछे हटने को तैयार नहीं है।
रूस की मध्यस्थता यहाँ काम आ सकती है क्योंकि तेहरान में उसकी बात सुनी जाती है। ईरान को पता है कि अगर वो अलग-थलग पड़ा, तो उसकी अर्थव्यवस्था ढह जाएगी। चीन और रूस ही दो ऐसे बड़े खिलाड़ी हैं जो ईरान का साथ दे रहे हैं। अगर रूस दबाव बनाता है, तो ईरान झुकने पर विचार कर सकता है। पर वाशिंगटन का क्या? अमेरिका फिलहाल इजरायल के दबाव में है। इजरायल किसी भी कीमत पर ईरान को परमाणु शक्ति बनते नहीं देखना चाहता।
मिडिल ईस्ट की इस बिसात के असली मोहरे
इस पूरे विवाद में सिर्फ तीन देश नहीं हैं। सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और इजरायल की भूमिका भी बहुत बड़ी है। इजरायल ने साफ कर दिया है कि वो अपनी सुरक्षा के लिए किसी भी हद तक जाएगा। रूस की पेशकश पर इजरायल की प्रतिक्रिया काफी ठंडी रही है। उसे लगता है कि रूस सिर्फ ईरान को वक्त देने की कोशिश कर रहा है ताकि वो अपनी ताकत और बढ़ा सके।
ईरान के भीतर भी दो फाड़ हैं। कट्टरपंथी चाहते हैं कि अमेरिका को करारा जवाब दिया जाए, जबकि उदारवादी धड़ा बातचीत के पक्ष में है। रूस की पेशकश ने तेहरान के भीतर की इस बहस को और तेज कर दिया है। अगर ईरान रूस की बात मान लेता है, तो उसे अमेरिका से कुछ रियायतें मिलने की उम्मीद है। लेकिन क्या अमेरिका इसके लिए तैयार होगा? खासकर तब जब वहां चुनाव का माहौल हो और कोई भी नेता ईरान के प्रति नरम नहीं दिखना चाहता।
कूटनीति के बंद कमरों में क्या चल रहा है
दिखने को तो ये सिर्फ एक बयान लगता है, लेकिन पर्दे के पीछे की कहानी अलग है। सूत्रों की मानें तो रूसी विदेश मंत्रालय के अधिकारी लगातार ईरानी और अमेरिकी प्रतिनिधियों के संपर्क में हैं। कतर और ओमान जैसे देश भी इसमें अपनी भूमिका निभा रहे हैं। रूस चाहता है कि एक ऐसा 'रोडमैप' तैयार किया जाए जिसमें दोनों पक्षों की इज्जत रह जाए।
ईरान के पास फिलहाल खोने के लिए बहुत कुछ है। उसकी मुद्रा रियाल की कीमत गिरती जा रही है और देश में बेरोजगारी बढ़ रही है। लोग सड़कों पर हैं। ऐसे में एक युद्ध ईरान के लिए आत्मघाती साबित हो सकता है। रूस इस कमजोरी को जानता है। वो ईरान को समझा रहा है कि फिलहाल पीछे हटने में ही भलाई है।
रूस की पेशकश के बाद अब आगे क्या
अब गेंद अमेरिका के पाले में है। अगर अमेरिका इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर देता है, तो वो दुनिया की नजर में युद्ध भड़काने वाला देश बन जाएगा। अगर वो इसे मान लेता है, तो उसे रूस की शर्त माननी होगी। ये एक बहुत ही पेचीदा स्थिति है।
आने वाले हफ्तों में हमें संयुक्त राष्ट्र में बड़ी हलचल देखने को मिल सकती है। रूस शायद एक औपचारिक प्रस्ताव सुरक्षा परिषद में रखे। भारत जैसे देशों के लिए ये स्थिति काफी चुनौतीपूर्ण है। भारत के ईरान और अमेरिका दोनों के साथ अच्छे संबंध हैं। भारत भी चाहेगा कि रूस की ये कोशिश रंग लाए ताकि क्षेत्र में शांति बनी रहे।
इस विवाद का हल गोलियों से नहीं, बल्कि मेज पर बैठकर ही निकलेगा। अगर वाकई रूस गंभीर है, तो उसे सिर्फ बयानबाजी से आगे बढ़कर ठोस कदम उठाने होंगे। ईरान को भी अपनी जिद्द छोड़नी होगी और अमेरिका को अपनी दादागिरी। दुनिया एक और बड़े युद्ध का बोझ नहीं उठा सकती।
अगले कुछ दिनों में अगर हाई-लेवल मीटिंग्स का दौर शुरू होता है, तो समझ लीजिए कि रूस का दांव काम कर गया है। नहीं तो, ये सिर्फ इतिहास के पन्नों में एक और नाकाम कोशिश बनकर रह जाएगी। फिलहाल नजरें व्हाइट हाउस और क्रेमलिन के अगले कदम पर टिकी हैं। अगर आप ग्लोबल मार्केट में निवेश करते हैं या अंतरराष्ट्रीय खबरों में रुचि रखते हैं, तो सोने और तेल की कीमतों पर नजर बनाए रखें। ये कीमतें ही बताएंगी कि युद्ध होगा या सुलह।