ब्रह्मांड कितना बड़ा है? हम अक्सर सोचते हैं कि हमारे सौर मंडल के बाहर क्या है। वैज्ञानिक सालों से आसमान में आंखें टिकाए बैठे हैं ताकि पृथ्वी जैसा कोई और ग्रह मिल सके। लेकिन इंसानी आंखें और पुराने कंप्यूटर धीमे थे। अब सब कुछ बदल चुका है। आर्टीफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई ने अंतरिक्ष विज्ञान में वो कर दिखाया है जिसकी कल्पना दस साल पहले भी मुश्किल थी। एआई ने हाल ही में करीब 10,000 नए संभावित ग्रहों की खोज करके वैज्ञानिकों को चौंका दिया है। इसने अंतरिक्ष के बंद दरवाजों को एक झटके में खोल दिया है। अचानक से हमारे पास जांच करने के लिए ग्रहों की संख्या दोगुनी हो गई है।
यह कोई छोटी-मोटी खोज नहीं है। इसने अंतरिक्ष विज्ञान के पूरे तरीके को बदल दिया है। डेटा का जो अंबार सालों से धूल खा रहा था, एआई ने उसे खंगालकर नए संसार ढूंढ निकाले हैं।
अंतरिक्ष विज्ञान में एआई की यह बड़ी छलांग क्यों मायने रखती है
वैज्ञानिक सालों से केपलर और टेस (TESS) जैसे स्पेस टेलिस्कोप से डेटा इकट्ठा कर रहे हैं। इन टेलिस्कोपों ने लाखों तारों पर नजर रखी। जब कोई ग्रह किसी तारे के सामने से गुजरता है, तो तारे की रोशनी थोड़ी कम हो जाती है। इसे ट्रांजिट कहते हैं। इंसानी वैज्ञानिकों के लिए लाखों तारों के लाइट कर्व्स को देखना और उनमें से असली ग्रहों को पहचानना लगभग असंभव था। डेटा इतना ज्यादा था कि वैज्ञानिक उसमें डूब रहे थे।
यहीं पर मशीन लर्निंग और न्यूरल नेटवर्क्स की एंट्री होती है। वैज्ञानिकों ने ऐसे एल्गोरिदम तैयार किए जो इंसानों से लाखों गुना तेजी से डेटा को स्कैन कर सकते हैं। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा और दुनिया भर के शोधकर्ताओं ने जब इस नए सिस्टम को पुराने डेटा पर लागू किया, तो परिणाम हैरान करने वाले थे। जो सिग्नल पहले 'शोर' या गड़बड़ी मानकर छोड़ दिए गए थे, उनमें से हजारों नए ग्रह निकल आए।
ग्रहों की संख्या अचानक लगभग दोगुनी होने का मतलब है कि ब्रह्मांड में जीवन की संभावना वाले ग्रहों की तलाश अब बहुत तेज हो जाएगी। हम अब सिर्फ अंधेरे में तीर नहीं चला रहे हैं। हमारे पास सटीक पते हैं।
शोर के पीछे छिपे संसार को कैसे पकड़ा गया
अंतरिक्ष से आने वाला डेटा साफ नहीं होता। उसमें तारों की अपनी हलचल, स्पेस क्राफ्ट की गड़गड़ाहट और ब्रह्मांडीय विकिरण का बहुत शोर होता है। पहले जब कोई वैज्ञानिक इस डेटा को देखता था, तो वो सिर्फ सबसे साफ और बड़े सिग्नलों को ही पकड़ पाता था। छोटे और धुंधले सिग्नल, जो अक्सर पृथ्वी जैसे छोटे पथरीले ग्रहों के होते हैं, छूट जाते थे।
- एआई एल्गोरिदम को पहले से ज्ञात ग्रहों के डेटा पर ट्रेन किया गया।
- इसने सीखा कि एक असली ग्रह का सिग्नल कैसा दिखता है और एक झूठा सिग्नल कैसा होता है।
- सिस्टम ने उन कमजोर सिग्नलों को भी पहचान लिया जो इंसानी आंखों से बच गए थे।
यह तकनीक इतनी सटीक है कि यह उन ग्रहों को भी ढूंढ निकालती है जो अपने तारे के बहुत करीब हैं या जिनका आकार बहुत छोटा है। इसमें सबसे अच्छी बात यह है कि इसके लिए हमें कोई नया अरबों डॉलर का टेलिस्कोप अंतरिक्ष में भेजने की जरूरत नहीं पड़ी। जो डेटा पहले से हमारे कंप्यूटरों में मौजूद था, बस उसे देखने का नजरिया बदल गया।
क्या इन 10,000 नए ग्रहों पर जीवन संभव है
ईमानदारी से कहें तो अभी हम पक्के तौर पर नहीं जानते। इन 10,000 नए खोजे गए पिंडों को अभी 'संभावित ग्रह' या प्लेनेटरी कैंडिडेट्स कहा जा रहा है। इसका मतलब है कि एआई ने अपनी तरफ से लिस्ट तैयार कर दी है, अब वैज्ञानिक दूसरे बड़े टेलिस्कोपों जैसे जेम्स वेब स्पेस टेलिस्कोप की मदद से इनकी पुष्टि करेंगे।
लेकिन सांख्यिकी के हिसाब से देखें तो यह एक बहुत बड़ा मौका है। इन हजारों ग्रहों में से कई ऐसे होंगे जो अपने तारे से बिल्कुल सही दूरी पर होंगे। वैज्ञानिक इसे 'गोल्डीलॉक्स ज़ोन' कहते हैं। यह वो इलाका होता है जहां न तो बहुत ज्यादा गर्मी होती है और न ही बहुत ज्यादा ठंड। ऐसी जगहों पर पानी तरल रूप में रह सकता है। और जहां पानी है, वहां जीवन की उम्मीद की जा सकती है।
कुछ ग्रह गैस के विशाल गोले हैं जैसे हमारा बृहस्पति। कुछ बिल्कुल ठंडे और बंजर हैं। लेकिन इस विशाल संख्या में से कुछ दर्जन ग्रह भी अगर पृथ्वी जैसे निकल आए, तो यह इंसानी इतिहास की सबसे बड़ी खोज होगी।
पुरानी पद्धतियों पर एआई की सीधी जीत
चर्चा इस बात पर भी होनी चाहिए कि पारंपरिक तरीके अब पीछे क्यों छूट रहे हैं। पहले एक शोधकर्ता को एक-एक तारे के डेटा का विश्लेषण करने में हफ्तों लग जाते थे। अगर कोई टीम बहुत बड़ी भी हो, तो भी वे साल में कुछ सौ ग्रहों से ज्यादा की पुष्टि नहीं कर पाती थी। एआई ने कुछ ही दिनों में लाखों सिग्नलों को प्रोसेस कर दिया।
यह गति ही सब कुछ बदल रही है। ब्रह्मांड लगातार फैल रहा है और हमारा डेटा भी। एआई के बिना हम इस डेटा के नीचे दब जाते। यह तकनीक थकती नहीं है। यह पक्षपात नहीं करती। इंसानी वैज्ञानिक कभी-कभी किसी खास तरह के ग्रह को खोजने में इतने खो जाते हैं कि वे दूसरी संभावनाओं को नजरअंदाज कर देते हैं। मशीन ऐसा नहीं करती। वह हर सिग्नल को एक ही तराजू में तोलती है।
खगोलविदों का कहना है कि इस तकनीक ने उनके काम को खत्म नहीं किया है, बल्कि उन्हें बोरिंग काम से आजादी दे दी है। अब वैज्ञानिकों को डेटा छानने की जरूरत नहीं है। उनका काम अब केवल उन ग्रहों का अध्ययन करना है जिन्हें एआई ने चुनकर सामने रख दिया है।
इस नई खोज का आपके और हमारे लिए क्या मतलब है
शायद आप सोच रहे होंगे कि दूर अंतरिक्ष में बैठे इन ग्रहों से आम इंसान का क्या लेना-देना। इसका सीधा संबंध इस बुनियादी सवाल से है कि क्या हम इस विशाल ब्रह्मांड में अकेले हैं? जब संभावित ग्रहों की संख्या अचानक दोगुनी हो जाती है, तो अकेले होने की संभावना आधी हो जाती है।
यह खोज तकनीक की ताकत को भी दिखाती है। जो एल्गोरिदम आज अंतरिक्ष में ग्रह ढूंढ रहा है, वही तकनीक कल चिकित्सा के क्षेत्र में नई दवाएं खोजने या पृथ्वी पर मौसम के मिजाज को समझने में काम आ रही है। यह दिखाता है कि डेटा का सही इस्तेमाल कैसे दुनिया बदल सकता है।
आगे का रास्ता साफ है। अगर आप खगोल विज्ञान में रुचि रखते हैं, तो अब केवल खबरों पर नजर रखना काफी नहीं है। डेटा अब पब्लिक डोमेन में उपलब्ध है। दुनिया भर के कई नागरिक वैज्ञानिक (सिटिजन साइंटिस्ट) भी इन एआई टूल्स का इस्तेमाल करके अपने स्तर पर रिसर्च कर रहे हैं। आप नासा के एक्सोप्लेनेट आर्काइव पर जा सकते हैं। वहां इस नए डेटा को खुद देख सकते हैं। ब्रह्मांड की समझ को बढ़ाने के लिए अब किसी बड़ी प्रयोगशाला की डिग्री होना जरूरी नहीं रह गया है, बस एक कंप्यूटर और सही एल्गोरिदम की समझ ही काफी है।